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आध्यात्म और व्यावसायिक जीवन में संतुलन कैसे बनाएं - कृपालुजी महाराज के विचार

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आज के भागदौड़ भरे समय में सबसे बड़ी चुनौती है आध्यात्मिकता और व्यावसायिक जीवन के बीच संतुलन बनाए रखना। जहां एक ओर व्यवसायिक सफलता हमारी आर्थिक स्थिरता और सामाजिक पहचान से जुड़ी है, वहीं आध्यात्मिकता हमारे भीतर शांति, आत्मबल और सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास करती है। जगद्गुरु कृपालु महाराज के विचार इस संतुलन को समझने और व्यावहारिक रूप से जीवन में अपनाने की प्रेरणा देते हैं। कृपालु महाराज का जीवन परिचय इस बात का उदाहरण है कि व्यक्ति चाहे कितना ही व्यस्त क्यों न हो, उसे आत्मा की शुद्धि और ईश्वर-स्मरण के लिए समय अवश्य निकालना चाहिए। 1922 में जन्मे कृपालुजी महाराज ने अपने प्रवचनों के माध्यम से बताया कि सच्चा आनंद किसी बाह्य वस्तु या पद में नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित दिव्य प्रेम में है। उनकी शिक्षाएँ केवल भक्तिभाव तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने बताया कि आध्यात्मिकता को व्यवसाय, परिवार और समाज हर क्षेत्र में जोड़ा जा सकता है। व्यावसायिक जीवन में आध्यात्म का महत्व व्यवसाय व्यक्ति के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सफलता पाने के लिए मेहनत, बुद्धिमत्ता और योजनाबद्ध दृष्टिकोण आवश्यक हैं। किं...

जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज: गया साधना शिविर एवं श्राद्ध पूजा

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आध्यात्मिक संग्रह के अद्वितीय स्वरूप, परम प्रेम के प्रतीक और भक्तों के दिलों में बसने वाले जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की अद्वितीय छवि ने सदैव उनके भक्तों के मनोबल को बढ़ावा दिया है। उनके श्री विभूषित संदेश और उपदेशों ने लाखों जीवों के जीवन में नई दिशा दिलाई है। जब वे इस लोक से गोलोक महाप्रयाण करने गए, तो भी उनके भक्तों ने उनकी आत्मा के विदाय रोकने का प्रयास किया और उनकी यात्रा को अपनी श्रद्धांजलि और प्रेम से भर दिया। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की पुण्यतिथि के अवसर पर, बिहार प्रान्त के गया नामक तीर्थ में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम के अंतर्गत उनके श्रद्धांजलि और पिंड दान का आयोजन किया गया, जो लौकिक और वैदिक परम्पराओं के अनुसार किए गए। इसके साथ ही, तीन बनाकर दिनों तक चलने वाला साधना शिविर भी आयोजित किया गया, जिसमें भक्तों ने आध्यात्मिक आदर्शों का अनुसरण करते हुए अपने आत्मा की ऊर्जा को नवीनतम स्तर तक पहुँचाने का प्रयास किया। कार्यक्रम की शुरुआत दिनांक 6 नवम्बर 2014 को फल्गुनदी स्थित अनुष्ठान क देवघाट पर हुई, जहाँ भक्तजन ने पवित्र नदी में स्नान करके अपन...

जगद्गुरु कृपालु परिषत् द्वारा आयोजित ब्रज में हुए महन्त भोज, साधु भोज एवं विधवा भोज

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जगद्गुरु कृपालु परिषद् ने वृंदावन में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें विशेष महंत भोज, साधु भोज और विधवा भोज का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन 11 नवम्बर 2014 को श्यामा श्याम धाम में किया गया था। इस कार्यक्रम के अध्यक्षाओं में सुश्री डॉ. विशाखा त्रिपाठी, सुश्री डॉ. श्यामा त्रिपाठी और सुश्री डॉ. कृष्णा त्रिपाठी शामिल थीं।  11 नवम्बर 2014 को जगद्गुरु कृपालु परिषद् ने ब्रज के विशिष्ट विभूतियों के सम्मान में एक विशेष महंत भोज का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में ब्रज के महंत, रासाचार्य और वैष्णव समुदाय के प्रमुख सदस्यों का सत्कार किया गया। 12 नवम्बर 2014 को जगद्गुरु कृपालु परिषद् ने एक विशाल साधु भोज का आयोजन किया, जिसमें 7000 साधुओं को आमंत्रित किया गया था। इस अद्भुत साधु भोज में विभिन्न साधु-संत और धार्मिक गुरुजनों ने भाग लिया और अपने आदर्शों और आशीर्वादों को साझा किया। 14 नवम्बर 2014 को प्रेम मंदिर प्रांगण में एक विशाल विधवा भोज का आयोजन किया गया, जिसमें 4000 विधवाएं शामिल हुईं। इस उपलब्धि के माध्यम से, जगद्गुरु कृपालु परिषद् ने विधवाओं के प्रति अपनी सामाजिक सहयोगी भाव...

जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज: भारतीय भक्ति की आध्यात्मिक धारा

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लोग प्रश्न करते हैं कि हमारे भारत में भगवान् की भक्ति तो बहुत दिखाई पड़ती है, घर-घर में मन्दिर हैं और यहाँ तो मरने के बाद भी राम नाम सत्य है बोला जाता है फिर इतना अनाचार, दुराचार, भ्रष्टाचार, पापाचार क्यों है ? इनको पता ही नहीं है भक्ति करनी किसको है? सब इन्द्रियों से भक्ति करते हैं- आँख से, कान से, रसना से, पैर से, हाथ से । निन्यानवे प्रतिशत लोग, इन्द्रियों से भक्ति करते हैं। पूजा- हाथ से, दर्शन- मन्दिर में जाकर मूर्ति के या सन्तों के आँख से, श्रवण- कान से भागवत सुन रहे हैं, रामायण सुन रहे हैं, मुख से नाम कीर्तन, गुण कीर्तन पुस्तकें पढ़ते हैं वेद मंत्र या गीता या भागवत या गुरु ग्रन्थ साहब कोई पुस्तक पाठ करते हैं रसना से, पैर से चारों धाम की मार्चिंग करते हैं। वैष्णो देवी जा रहे हैं, कहीं बद्रीनारायण जा रहे हैं ये सब नाटक करते हैं हम लोग। ये सब साधना नहीं है ये तो जैसे जीरो में गुणा करो एक करोड़ से तो भी जीरो आयेगा ऐसे ही इन्द्रियों के द्वारा जो भक्ति की जाती है भगवान् उसको लिखते ही नहीं, नोट नहीं करते वो तो व्यर्थ की है बकवास है, अनावश्यक शारीरिक श्रम है। उपासना, या भक्ति या साधना म...

वैराग्य क्या है? वैराग्य कब होता है?: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज द्वारा वैराग्य का स्वरूप

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प्रायः लोग राग शब्द का अर्थ प्यार ही करते हैं, पर ऐसा नहीं है, राग का अर्थ है मन का लगाव, वह मन का लगाव प्यार से हो या खार से हो। अर्थात् अनुकूल भाव या प्रतिकूल भाव, किसी भी भाव से मन की आसक्ति, आसक्ति ही कहलाएगी और जब न अनुकूल भाव से आसक्ति हो और न प्रतिकूल भाव से आसक्ति हो तभी वैराग्य कहलायेगा । स्थूल बुद्धि से यों समझिये कि जब आप किसी प्रिय का चिन्तन करते हैं तो सदा सर्वत्र उसी में मन व्यस्त रहता है, यह कब मिलेगा, कैसे मिलेगा, कहाँ मिलेगा, बड़ा अच्छा आदमी है, हमारा हितैषी है, हमारा प्रेमी है' इत्यादि । ठीक इसी प्रकार, जिससे आपका द्वेष हो जाय, वहाँ भी सदा सर्वत्र मन व्यस्त रहता है कि वह कहाँ मिलेगा, कब मिलेगा, कैसे मिलेगा, वह हमारा शत्रु है, अनिष्टकारी है, उसे मारना है, इत्यादि । उपर्युक्त रीति से प्यार एवं खार दोनों ही में एक सी स्थिति मन की रहती है। यही प्रमुख कारण है कि अनुकूलभाव से मन को श्यामसुन्दर से एक कर देने वाली गोपियाँ भी भगवत्-स्वरूपा बन गयीं एवं प्रतिकूल भाव से मन को श्यामसुन्दर में एक कर देने वाले कंसादिक भी भगवत्स्वरूप बन गये। बस, यही अवस्था वैराग्य की है। जैसे...

जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज : आप कौन हैं एवं आप अपना आनन्द चाहते हैं या किसी और का चाहते हैं

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जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज के उपदेशों के माध्यम से आत्म-स्वरूप की विचारधारा: अब आप यह विचार करें कि आप कौन हैं एवं आप अपना आनन्द चाहते हैं या किसी और का चाहते हैं। आप कहेंगे कि मैं कौन हूँ यह तो नहीं जानता किन्तु इतना जानता हूँ कि मैं केवल अपना ही आनन्द चाहता हूँ। यदि आप मायिक तत्त्व होते तो मायिक पदार्थों से आपको आनन्द-प्राप्ति हो जाती, किन्तु आप ईश्वर के अंश है अतएव ईश्वरीय दिव्यानन्द से ही आप आनन्दमय हो सकते हैं। तर्कसम्मत सिद्धान्त भी है, साथ ही अनादिकाल के अनुभव से भी सिद्ध है कि यदि मायिक आनन्द से दिव्य जीव को दिव्य आनन्द मिलना होता तो अनन्तानन्त युगों से अब तक मायिक सुख मिलते हुए हम इस प्रकार दुःखी, अशान्त, अतृप्त, अपूर्ण न रहते। यह अनुभव-प्रमाण ही यह बोध कराने में समर्थ है कि हम मायिक नहीं हैं। फिर भी हमें इस तत्त्व पर गम्भीर विचार करना है। कुछ भोले प्रत्यक्षवादी कहते हैं कि इन्द्रियादि की भाँति आत्मा भी देह का परिणाम है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु बस इन्हीं ४ तत्वों से देह एवं 'मैं' बना है। अर्थ एवं काम दो पुरुषार्थ हैं। प्रत्यक्ष प्रमाण ही प्रमाण है। इन प्रत्यक्षवा...

Unconditional Grace: Showering Mercy Without Expectation

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The word grace actually means a useless grace and mercy that is showered or bestowed upon someone without expecting anything in return. This word his word grace has been used in the Vedas and Puranas and is also a word used in our world. Every religion talks about grace: Hinduism, Christianity, Islam, Sikhism, and Judaism, etc. All religions state unanimously that God showers His grace. What is the meaning of grace and who is authorised to shower it? The word grace actually means "causeless grace and mercy" that is showered or bestowed upon someone without expecting anything in return. For example, when a child is born the mother serves the child in every possible way. She talks to the child, takes care of all the child's needs, and expects nothing in return. In fact, the child is unable to do anything on its own. Thus, whatever a mother does for her child can be termed grace. However, in reality, this is not true grace at all, nevertheless, this example does serve to so...

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj: Our Gurudeva was the personified form of grace.

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When it came to giving his grace, Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj was notable for his unflinching impartiality to bestow his grace. He persisted in his chore to extend grace to everyone without exception. This unmatched quality gave the impression that grace permeated every aspect of his being, penetrating both his words and actions. He always guides people through his profound teaching which can help people to live their life in a blissful way. Showering grace wasn't just work for Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj ; it was part of who he was. It evolved into his constant condition, one that persisted whether he was awake or asleep, sitting or standing, or even doing extraterrestrial feats. His example demonstrated how grace was more than simply a habit for him; it was a natural aspect of who he was that he couldn't help but share with others. It is important to note that Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj's grace was not a limited commodity. It wasn't something th...

Jagadgururu Shri Kripalu Ji Maharaj: Radha Rani is Grace Personified

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Kishori Ji is the personified form of grace. She is made of grace from the inside as well as the outside. She has no other work to perform except showering grace. She has no other desire. Kishori Ji is the personified form of grace. She is made of grace from the inside as well as the outside. She has no other work to perform except showering grace. She has no other desire. A Deity or statue is made of a single element. It could be wood, iron, stone, terracotta, clay, gold or silver, and so on. The material used to make it is consistent throughout, on the inside as well as the outside. Only one material permeates every part of the Deity, be it the nose, ears, face, limbs, or any other part. If the Deity is carved from stone, for example, then it will be stone all over both inside and outside. However, this is not the case with the human body which consists of a number of different elements, such as fire, air, water; a divine soul, and so on. Just as a Deity is made entirely of a single...