कृपालुजी महाराज ने समर्पण के बारे में जो 5 बातें कहीं वो कोई और नहीं बताएगा
आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले हर व्यक्ति के लिए "समर्पण" सबसे महत्वपूर्ण शब्दों में से एक है। लेकिन वास्तव में समर्पण का अर्थ क्या है? क्या इसका मतलब अपनी इच्छाओं को छोड़ देना है या फिर भगवान पर पूर्ण विश्वास करना? इस विषय पर अनेक संतों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं, लेकिन जगद्गुरु कृपालु महाराज ने समर्पण को जिस सरल और गहराई से समझाया, वह आज भी लाखों भक्तों के लिए मार्गदर्शक बना हुआ है। आइए जानते हैं समर्पण के बारे में उनकी बताई गई पाँच महत्वपूर्ण बातें। 1. समर्पण का अर्थ हार मानना नहीं है बहुत से लोग सोचते हैं कि समर्पण का मतलब परिस्थितियों के सामने झुक जाना है। लेकिन कृपालुजी महाराज के अनुसार, सच्चा समर्पण भगवान की इच्छा पर विश्वास रखना है। यह कमजोरी नहीं बल्कि आंतरिक शक्ति का प्रतीक है। 2. अहंकार छोड़ना ही समर्पण की शुरुआत है जब तक व्यक्ति अपने ज्ञान, पद या उपलब्धियों का अभिमान करता रहता है, तब तक वह पूर्ण समर्पण नहीं कर सकता। समर्पण का पहला कदम अपने अहंकार को कम करना और स्वयं को ईश्वर का सेवक मानना है। 3. प्रेम के बिना समर्पण अधूरा है समर्पण केवल शब्दों या कर्मकांडों से ...